Tuesday, December 23, 2014

देवी प्रसाद मिश्र कृत 'फ़ासिस्ट' और उसके विभिन्न अनुवाद



देवी प्रसाद मिश्र
फ़ासिस्ट

मैंने कहा कि आप फ़ासिस्ट हैं
तो उसने कहा कि वह मनुष्य है


मैंने कहा कि आप फ़ासिस्ट हैं
तो उसने कहा कि वह जनप्रतिनिधि है


मैंने कहा कि आप फ़ासिस्ट हैं
तो उसने कहा कि उसके पास आधार कार्ड है


मैंने कहा कि आप फ़ासिस्ट हैं
तो उसने कहा कि वह शाकाहारी है 


मैंने कहा कि आप फ़ासिस्ट हैं
तो उसने कहा कि मुद्दा विकास है


(मैंने बिनास सुना)

मैंने कहा कि आप फ़ासिस्ट हैं
तो उसने कहा कि उसके पास तीस फ़ीसदी का बहुमत है
सत्तर फ़ीसदी के अल्पमत की तुलना में


मैंने कहा कि आप फ़ासिस्ट हैं तो उसने कहा कि
गांधी को हमने नहीं मारा हममें से किसी ने उन पर गोली चला दी 


मैंने कहा कि आप फ़ासिस्ट हैं
तो उसने कहा कि अब जो कुछ हैं हमीं हैं

--
(जनवरी में प्रकाश्य 'जलसा' ४ संकलन से उद्धृत)


* * *

1.
THE FASCISTS

I said, You are a fascist.
He said he is human.

I said, You are a fascist.
He said he is people’s representative.

I said, You are a fascist.
He said he has the Aadhaar Card.

I said, You are a fascist.
He said he is a vegetarian.

I said, You are a fascist.
He said the issue is development.

(I sensed ruin )

I said, You are a fascist. He said he has a majority
of thirty percent against seventy.

I said, You are a fascist.
He said, We did not kill Gandhi. Only someone who was with us fired at him.

I said, You are fascists.
He said, But then we alone are.

(Tr. Rajesh Sharma)

* * *

2.
SIR, YOU’RE A FASCIST


I said - Sir, you're a fascist
He said - No, I'm just a human being

I said - Sir, you're a fascist
He said he represents the people

I said - Sir, you're a fascist
He said he holds an Aadhar Card

I said - Sir, you're a fascist
He said he is a vegetarian

I said - Sir, you're a fascist
He said agenda is development

(I heard desolate)

I said - Sir, you're a fascist
He said he has a majority of thirty percent
against a minority of seventy

I said - Sir, you're a fascist
He said we didn't kill Gandhi, someone from the gang
just took a shot at him

I said - Sir, you're a fascist
He said - drop it mate
Whatever we are, we're everything.

(Tr. Tarun Bhartiya)

* * *

3.
THE FASCIST

I said you are a fascist
He said just human

I said fascist
He said elected

I said fascist
He had his Aadhaar Card

I said you are a fascist
Vegetarian he said

Fascist!
The issue is Development he said

(I heard slaughter)

You are a fascist
But a majority of thirty
over minor-ities of seventy he said

I said fascist and he said we didn’t
Kill Gandhi … a patriot fired a shot

A fascist you are, I said
Whatever, there’s now only us, he said

(Tr. Asad Zaidi)


 * * *


फॅसिस्ट

मी म्हटलो, तू फॅसिस्ट आहेस
तो म्हणाला, मी माणूस आहे


मी म्हटलो, तू फॅसिस्ट आहेस
तो म्हणाला, मी लोकप्रतिनिधी आहे


मी म्हटलो, तू फॅसिस्ट आहेस
तो म्हणाला, माझ्याजवळ आधारकार्ड आहे


मी म्हटलो, तू फॅसिस्ट आहेस
तो म्हणाला, मी शाकाहारी आहे


मी म्हटलो, तू फॅसिस्ट आहेस
तो म्हणाला, मुद्दा विकासाचा आहे


(मला 'विनाशाचा' असं ऐकू आलं-)


मी म्हटलो, तू फॅसिस्ट आहेस
तो म्हणाला, माझ्याकडे तीस टक्के बहुमत आहे
सत्तर टक्के अल्पमताच्या तुलनेत


मी म्हटलो, तू फॅसिस्ट आहेस तर तो म्हणाला,
गांधीला आम्ही नाही गोळ्या घातल्या आमच्यापैकी कुणीतरी त्याला मारलं


मी म्हटलो, तू फॅसिस्ट आहेस
तो म्हणाला, आता जे काही आहोत ते आम्हीच.


(अनुवाद : गणेश विस्पुते)

 * * *



فاشسٹ
دیوی پرساد مشر کی تازہ نظم


میں نے کہا آپ فاشسٹ ہیں
تو اس نے کہا کہ وہ انسان ہے


میں نے کہا آپ فاشسٹ ہیں
تو اس نے کہا کہ وہ عوامی نماُندہ ہے


میں نے کہا آپ فاشسٹ ہیں
تو اس نے کہا کہ اسکے پاس آدھار کارڈ* ہے


میں نے کہا آپ فاشسٹ ہیں
تو اس نے کہا کہ وہ شاکاہاری** ہے


میں نے کہا آپ فاشسٹ ہیں
تو اس نے کہا کہ اصل مسٗلہ ترقّی ہے


 (میں نے تنزل سنا)

میں نے کہا آپ فاشسٹ ہیں
تو اس نے کہا کہ اس کے پاس تیس فیصد کی اکثریت ہے
ستّر فیصد کی اقلیت کے مقابل


میں نے کہا آپ فاشسٹ ہیں تو اس نے کہا کہ
گاندھی کو ہم نے نہیں مارا ہم میں سے کسی نے ان پر گولی چلا دی


میں نے کہا آپ فاشسٹ ہیں
تو اس نے کہا کہ اب جو کچھ ہیں ہمیں ہیں
 

(ترجمہ اسد زیدی)
حواشی : *آدھار کارڈ ۔ ہندوستان میں ہر شہری کو دیا جانے والا شناختی کارڈ **شاکاہاری ۔ ویجیٹیرین

Tuesday, April 29, 2014

एक कवि सदा के लिए


"Pan Tadeusz"
Tadeusz Różewicz, 1921-2014


To write poetry after Auschwitz is barbaric, and this corrodes even the knowledge of why it has become impossible to write poetry today.” (Adorno)

Is poetry possible after Auschwitz?

In the work of quite a few poets – Tadeusz Różewicz and Paul Celan among them – we find a recognition of, and a serious attempt to answer, the troubling question. Of all nationalities and languages, it is the Polish who took up the challenge to address it urgently and collectively. Thus was formed the ethics and poetics of post-War Polish poetry. A whole generation of poets were immersed in it – the most eminent among them was the now well-known quartet of Tadeusz Różewicz, Zbigniew Herbert, Wisława Szymborska, Czesław Miłosz.  Their voice reached much beyond Europe and in case of Różewicz transcended the barriers of language and culture to influence every human being who even randomly came in touch with it.

Różewicz brought his avant garde instinct to bear upon the most austere and ethically sustainable poetic tradition in the twentieth century. This makes him a genuine successor of César Vallejo and to some extent Bertolt Brecht, the great poets of the inter-war years, and outside his generation of Polish poets he had the company of contemporaries like Paul Celan and Andrei Voznesensky.

A few centuries down the line, if the civilisation still survives, he would come across as well as the great poets of the Tang era, the medieval Persia, the Punjabi Sufi tradition or the Urdu classicism still do today.

————
GRASS

I grow
in the bondings of walls 

where they are
joined
there where they meet
there where they are vaulted


there I penetrate
a blind seed 

scattered by the wind

patiently I spread
in the cracks of silence
I wait for the walls to fall 

and return to earth

then I will cover 
names and faces

1962
Tr. Adam Czerniawski

———

घास

मैं उगती हूँ
दीवारों की संधि में
वहाँ जहाँ वे
जुड़ती हैं
वहाँ जहाँ वे आ मिलती हैं
वहाँ जहाँ वे मेहराबदार हो जाती हैं

वहाँ मैं बो देती हूँ
एक अंधा बीज
हवाओं का बिखेरा गया

धैर्य के साथ मैं फैलती हूँ
सन्नाटे की दरारों में
मुझे इन्तिज़ार है दीवारों के गिरने
और ज़मीन पर लौटने का

तब मैं ढक लूँगी
नाम और चेहरे

१९६२
अनुवाद : असद ज़ैदी

Sunday, January 6, 2013

जलसा (संकलन 3 : एक सदी)


 जलसा 3 (एक सदी)


रचनाक्रम :

एक जन्मशताब्दी और बीसवीं सदी से कुछ मौतें
विस्वावा शिम्बोर्स्का : कविताएँ : सदी के मोड़ पर, बहन की प्रशंसा में       
लाल्टू : कविता : शब्द मिले अनंत तो क्यों प्रलापमय   
सईद अख्‍तर मिर्ज़ा : सलाम अलैकुम, अम्मी (अनु.: भारतभूषण तिवारी)   
पंकज चतुर्वेदी : सात कविताएँ       
देवी प्रसाद मिश्र की कुछेक कविताएँ        
हरि मृदुल : सात कविताएँ         
हेमंत शेष : वर्णमाला: पैंसठ कहानियाँ        
त्रिभुवन : सत्रह कविताएँ        
कमलानाथ : कहानी : भौंर्या मो    
शुभा : गद्य : उजड़े हुए प्रवासी की डायरी से       
शिवप्रसाद जोशी : संगीतघर - पाँच कविताएँ       
दीपक बनर्जी : अमीर ख़ाँ: आदमी और संगीत (अनु.: अशोक पांडे)   
सफ़दर शामी : अमीर ख़ाँ - कुछ रेखाचित्र     
हिमांशु कुमार : सात कविताएँ         
अंशु मालवीय : कविता : आओ क़साब को फाँसी दें        
सौम्य मालवीय : कविता : क़साब       
एड्रिएन रिच : कुछ कविताएँ एक निबंध (अनु.: भारतभूषण तिवारी)   
मिलोश मात्सोउरेक : बाल कहानियाँ (अनु.: असद ज़ैदी)  

और कुछ तस्वीरें
 ---


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Friday, November 30, 2012

क़साब : दो कविताएँ

अंशु मालवीय
"आओ क़साब को फाँसी दें !"


उसे चौराहे पर फाँसी दें !
बल्कि उसे उस चौराहे पर फाँसी दें
जिस पर फ़्लडलाइट लगाकर
विधर्मी औरतों से बलात्कार किया गया
गाजे-बाजे के साथ
कैमरे और करतबों के साथ
लोकतंत्र की जय बोलते हुए

उसे उस पेड़ की डाल पर फाँसी दें
जिस पर कुछ देर पहले खुदकुशी कर रहा था किसान
उसे पोखरन में फाँसी दें
और मरने से पहले उसके मुँह पर
एक मुट्ठी रेडियोएक्टिव धूल मल दें

उसे जादूगोड़ा में फाँसी दें
उसे अबूझमाड़ में फाँसी दें
उसे बाटला हाउस में फाँसी दें
उसे फाँसी दें...कश्मीर में
गुमशुदा नौजवानों की बेनिशान क़ब्रों पर

उसे एफ़.सी.आई. के गोदाम में फाँसी दें
उसे कोयले की खदान में फाँसी दें.
आओ क़साब को फाँसी दें !!

उसे खैरलांजी में फाँसी दें
उसे मानेसर में फाँसी दें
उसे बाबरी मस्जिद के खंडहरों पर फाँसी दें
जिससे मज़बूत हो हमारी धर्मनिरपेक्षता
कानून का राज कायम हो

उसे सरहद पर फाँसी दें
ताकि तर्पण मिल सके बँटवारे के भटकते प्रेत को

उसे खदेड़ते जाएँ माँ की कोख तक... और पूछें
ज़मीनों को चबाते, नस्लों को लीलते
अज़ीयत देने की कोठरी जैसे इन मुल्कों में
क्यों भटकता था बेटा तेरा
किस घाव का लहू चाटने ....
जाने किस ज़माने से बहते हैं
बेकारी, बीमारी और बदनसीबी के घाव.....

सरहद की औलादों को ऐसे ही मरना होगा
चलो उसे रॉ और आई.एस.आई. के दफ़्तरों पर फाँसी दें
आओ क़साब को फाँसी दें !!

यहाँ न्याय एक सामूहिक हिस्टीरिया है
आओ क़साब की फाँसी को राष्ट्रीय उत्सव बना दें

निकालें प्रभातफेरियाँ
शस्त्र-पूजा करें
युद्धोन्माद,
राष्ट्रोन्माद,
हर्षोन्माद
गर मिल जाए कोई पेप्सी-कोक जैसा प्रायोजक
तो राष्ट्रगान की प्रतियोगिताएँ आयोजित करें
कंगलों को बाँटें भारतमाता की मूर्तियाँ
तैयारी करो कम्बख़्तो ! फाँसी की तैयारी करो !

इस एक फाँसी से
कितने मसले होने हैं हल
निवेशकों में भरोसा जगना है
सेंसेक्स को उछलना है
ग्रोथ रेट को पहुँच जाना है दो अंकों में

कितने काम बाक़ी हैं अभी
पंचवर्षीय योजना बनानी है
पढ़नी है विश्व बैंक की रपटें
करना है अमरीका के साथ संयुक्त युद्धाभ्यास
हथियारों का बजट बढ़ाना है...
आओ क़साब को फाँसी दें !

उसे गाँधी की समाधि पर फाँसी दें
इस एक काम से मिट जायेंगे हमारे कितने गुनाह

हे राम ! हे राम ! हे राम !..."


---



सौम्य मालवीय
क़साब
 

एक अरसा हो गया था क़साब

सुनते हुए तुम्हारा नाम

इस बीच ये भी पढ़ा अख़बारों में कि कब तुमने जम्हाई ली!

किसी सत्र में तुम मुस्कुराये भी शायद!

कुछ जिरह की अपनी तरफ़ से

अपने वकील से कहा कुछ

और भी बहुत कुछ सुना, पढ़ा, देखा तुम्हारे बारे में कई बार

इतना कि कुछ अपनापन सा हो गया था तुमसे!

जैसे हमारे असंदिग्ध नरक में तुम देर तक और दूर तक चलने वाला

कोई इंतज़ाम हो गए थे

समाचार चैनल आये दिन

तुम पर 'ओपिनियन पोल' चलाते थे

और ख़ुश थीं मोबाइल कम्पनियाँ की राष्ट्रहित में बटन दबाने को

कई तत्पर और तत्सम भारतीय

सदैव तैयार होते थे

पुटुर-पुटुर, पट-पट

दाहिने-बाएँ, दाहिने-बाएँ

पुटुर-पुटुर, पट-पट

फिर एक दिन अचानक

एक निष्कपट से लग रहे बुधवार को

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र ने

तुम्हें फाँसी पर लटका दिया

गहरी गोपनीयता में मगर,

चुपचाप, गुपचुप-गुपचुप

दम साधे रहस्य का तम साधे हुए

यरवदा जेल के गाँधी अनुप्राणित वातावरण में

तुम्हारी झूलती हुई देह वह अक्ष बनी

जिस पर थिर हुआ राजनीतिक संतुलन

और कुछ संतरियों, अधिकारियों और

एक सरकारी डॉक्टर के बीच

जनतंत्र शिरोमणि हुआ!

पर जो भी हुआ इस ख़ामोश-लबी के साथ क्यूँ हुआ

तुम कोई भगत सिंह तो थे नहीं !

कि जेल के दरो-दीवार तक इस फ़ैसले से

बग़ावत कर उठते

फिर ये एहतियात ये चुप्पा-घात क्यूँ?

शायद इसलिए कि प्रतिशोध

चाहे वह दुनिया के

सबसे बड़े लोकतंत्र ने ही क्यूँ न लिया हो

कहीं न कहीं लज्जास्पद भी होता है

क्या तुमसे इंतक़ाम लेकर

कुछ घंटों के लिए ही सही

आर्यावर्त शर्मसार हो गया था क़साब !

हत्या के बाद का चेतनालोप

वह जो कुछ देर के लिए हत्यारे को शून्य कर देता है ...

पता नहीं क्यूँ

पर लोकतंत्र की इस तरतीब से मुझे

भगत सिंह का ध्यान हो आया है

भगत सिंह, क़साब तुम जानते नहीं होगे शायद

वह बीसवीं सदी के बसंत का

एक क्रांतिचेता बीज था

तुम्हें तो यह कौल भी नहीं होगा

कि तुमने जो क्या वो क्यूँ किया

पर उसे क़साब, भगत सिंह को

वह जो गुजराँवाला पाकिस्तान में जन्मा था

उसे सब पता था

जैसे इतिहास की कच्छप गति

कब ख़रगोश की तरह हो जाती है

और किस तरह वह एक गहरे गढ्ढे में गिर जाता है

इसलिए क़साब भगत सिंह

एक कठिन चुनौती था

उसे मारा ब्रिटिश हुकूमत ने यूँ ही मुँह चुराकर

जैसे नवम्बर की एक सुबह

कुहासे का भेद छटने से पहले ही तुम्हें

फाँसी पर लटका दिया

पर तुम क़साब

कोई फ़लसफ़ाई इंक़लाबी तो थे नहीं

कार्गो पहने और कलाशनिकोव से अँधाधुंध गोलियाँ बरसाते

तुम किसी विडियो-गेम के मूर्तिमना पात्र जैसे मालूम हुए थे

और फिर ये मीडिया वाले तो तुम्हें

आतंकी का भी ओहदा नहीं देते क़साब

वे तो तुम्हे बंदूक़धारी या 'गनमैन' बुलाते हैं

तुम तो शायद बिना जाने ही मर गए

कि तुमने क्या किया

और ख़ुदा जाने जन्नत का एक पाक परिंदा बनने का

तुम्हारा सपना पूरा हुआ भी या नहीं

पर हम बहुत अच्छे से जानते हैं कि तुमसे हमें क्या मिला

तुमने हमें अमेरिकी 9/11 की तर्ज पर

अपना, ख़ालिस अपना 26/11 देकर

घटनाओं की दुनिया में स्वराज दिया क़साब

शायद इसीलिए तुम्हे गाँधी के जेल यरवदा ले गए थे ...

तुम शायद "एक्स " थे क़साब

जिसे गणित में सवाल हल करने के लिए फ़र्ज कर लेते हैं

तुमसे भी तो हल किये गए कई सवाल

जैसे कि चुस्त ही हुआ राष्ट्र का समीकरण,

धर्म के प्रमेय सिद्ध हुए,

सत्ता की खंडित ज्यामिति ने अपनी सममिति पा ली

इसीलिए शायद तुम्हें ठिकाने लगाने की योजना को

नाम दिया गया "ऑपरेशन एक्स" ...

क़साब फ़रीदकोट की धरती एक्स ही जनती है

और तुम जानते नहीं कि तीसरी दुनिया में कितने फ़रीदकोट हैं

धरती के चेहरे पर चकत्तों की तरह उभरे हुए

क़साब तुम्हारी मौत

कोई अंत नहीं, एक्स जैसे चरों की चरैवेति है ...

तुम तो मर गए क़साब

पर हमारे लिए कई सवाल पैदा कर गए हो

जैसे अगर विश्व के सबसे शक्तिशाली लोकतंत्र का राष्ट्रपति

13 साल की उम्र में घरबदर हो गया होता

तो उसका क्या होता?

क्या तब भी उसे नोबेल का शांति पुरस्कार मिलता?

जिसे सर पर पहन कर वह यूँ ही ग़ज़ा पर हमले की ताईद करता?

जैसे वह पाकिस्तान में दरगाहें क्यूँ गिरा रहे हैं क़साब?

वैसे ही दरगाहें जिनमे घर से बेज़ार होने के बाद

तुमने कुछ रातें गुज़ारी थीं

जैसे चारमीनार से सट कर मंदिर बन गया है कैसे?

जैसे ये

जैसे वो

जैसे ये चिरायंध कैसी है क़साब

ये धुआँ कैसा है ...

Monday, January 16, 2012

ग़ाज़ियाबाद के बिल्डरों तो आप जानते ही हैं

पत्रिका

ग़ाज़ियाबाद के बिल्डरों तो आप जानते ही हैं
उनमें से एक ने राजनीतिक सांस्कृतिक पत्रिका निकाली

जिसमें विचारधाराओँ वाले लोग
कविताएँ वग़ैरह समीक्षाएँ वग़ैरह विचार वग़ैरह लिखने लगे

पत्रिका निरंतर घाटे में निकल रही थी
लेकिन मालिक को घाटा नहीं हो रहा था वह
नौकरशाहों और मंत्रियों के पास जाया करता था
और पत्रिका के अंक दिखाया करता था

मतलब कि वह बिना यह कहे ताक़तवरों को
डराया करता था कि ये बड़े बड़े विचारक आप पर
बहुत विश्लेषणात्मक तरीक़े से लिख सकते हैं
मतलब कि आप के धंधों पर और आपके घपलों पर
मतलब कि आप भी हमें देश को उजाड़ने दें कि जैसे
हम आपको हर तरह के पतन का मौक़ा दे रहे हैं
नहीं तो जैसा कि मैंने बिना कहे कहा कि
ये बड़े बड़े लोग आप पर बहुत
विश्लेषणात्मक तरीक़े से लिख सकते हैं
और जो अपना विश्लेषण कम करते हैं
और जो आप ही देखिये हम जैसे अपराधियों के पैसे से
कितनी अच्छी और मानवीय पत्रिका निकालते रहते हैं

− देवी प्रसाद मिश्र

--

जलसा २०१० ('अधूरी बातें') में प्रकाशित

Friday, January 13, 2012

आधुनिकतावाद

रोमेंटिक संवेग भोले-भालेपन की मांग करता है और बताता है कि बहुत सी चीज़ों की 'पवित्रता' अभी बची हुई है। यह पवित्रता दरअसल चीज़ों के होने में, उनकी सचाई में यक़ीन का ही दूसरा रूप है कि उनका जादू अभी बाक़ी है। उन्हें आदर और आकर्षण के साथ, इच्छा और दूरी के साथ देखा जाता है। ऐसी एक दुनिया आपके इर्द-गिर्द बन जाती है जो आपको लुभाती है और ऊँचा उठाती है। लेकिन आधुनिकतावाद इस रोमेंटिक संवेग के सुकुमार तंतु को जला देता है। दुनिया और चीज़ें अचानक अपना जादू खो देती हैं, हर चीज़ दाग़ी हो जाती है, हर चीज़ आहार में बदल जाती है, हर चीज़ संदेह में घिर जाती है, वर्तमान और भविष्य और अतीत एक दूसरे में संचरण करते हुए नहीं आते। यह लय, यह सिंफ़नी छिन्न-भिन्न हो जाती है, तार बीच में से टूट जाता है। आप पतंग की तरह आकाश में हल्के हो अनायास उठते चले जाएं, इसके बजाए पतंग कट-फट कर किसी कँटीली झाड़ी में उलझ जाती है। आधुनिकतावाद उड़ते पक्षी को मारकर क़दमों में गिरा देता है। इस तरह का टेढ़ापन और सिनिसिज़्म आधुनिकतावाद के लिए ज़रूरी है।

लेकिन आधुनिकतावाद रोमानियत का ही पिछवाड़ा तो है। उसी की असलियत का साक्षात्कार! रोमेंटिसिज़्म ने जिस चीज़ को बना कर दिखाया है, आधुनिकतावादियों ने उसे खोल कर दिखा दिया (या कहें कि रोमेंटिसिज़्म ने रंगाई पुताई की, आधुनिकतावाद ने ब्लीचिंग कर दी)। आधुनिकतावादियों में प्रच्छन्न रोमेंटिक भरे पड़े हैं या कहें कि हर आधुनिकतावादी में एक शर्मिन्दा रोमेंटिक बैठा है तो ग़लत न होगा। जिस तरह हर सिनिक में एक ठगा हुआ और नाराज़ भोला-भाला आदमी बैठा हुआ है।

मनमोहन

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जलसा २०१० ('अधूरी बातें') में प्रकाशित

Wednesday, January 11, 2012

सहस्तर का फूल

सहस्रताल टिहरी-गढ़वाल की भीलांगना घाटी के विकराल पर्वतों पर स्थित एक भीषण ताल है जो कि बहुत दुर्गम है। स्थानीय ग्रामीण जन सहस्रताल को "सहस्तर" पुकारते हैं और कहते हंैं - ‘जर्मन की लड़ाई’, सहस्तर की चढ़ाई। सहस्रताल की यात्रा से लौटने पर एक दिन मैंने यह कामना की :


काश मैं सहस्तर का फूल होती। कोई हृदयहीन हाथ मुझे तोड़ता तो मेरी डाल के असंख्य महीन कांटे उसमें विषैले डंक मारते। कोई मूर्खतापूर्ण शब्दों में मेरी प्रशंसा करता तो सहस्तर की लहरों का गर्जन उसके भोंडे स्वर को कुचल डालता। कोई मुझे सूँघने की जुर्रत करता तो मेरी चीर देने वाली तेज़ कटार सी खुशबू उसे बेहोश कर डालती। मेरा पवित्र एकान्त भंग करने वहाँ बेहया भीड़ न होती। कोई इक्का-दुक्का दर्शक वहाँ आता भी तो भीषण डांगरों को पार कर प्रचन्ड वन से गुज़रता एक एक चट्टान पर पैर जमाता, भूख प्यास सहता, अथक श्रम और साहस से हाँफ़ता यहाँ तक पहुँचता और उन ऊँचाइयों पर मुझे खिला पाकर किसी अज्ञात भाव में डूब कर मुझे देखता।

काश में सहस्तर का फूल होती। मेरी नश्वरता अभिशप्त न होती। मैं बड़ी उछाह से एक दिन सूरज और एक रात चाँद की किरनें पी कर चुपचाप अपार गरिमा के साथ झर जाती और झर कर अपनी ही जड़ों पर गिर पड़ती। सिवाय खिलने के मेरी कोई उपयोगिता न होती। अपने अस्त्तिव का औचित्य मैं स्वयं होती और स्वयं ही अपने अस्त्तिव का प्रमाण होती।

काश मैं सहस्तर का फूल होती। मैं केवल पृथ्वी पर अन्तहीन आकाश के नीचे जीवन का क्षणिक और चमत्कारिक उन्मेष होती।

मैं बिकती नहीं सजती नहीं, आर-पार चिर कर किसी माला का अंग न होती, मैं किसी फूलदान में क़ैद न होती, अर्थियों पर न होती, मैं प्रदर्शनी में न होती, मैं बग़ीचे में न होती, मैं किसी जूड़े का गहना न होती, मैं किसी के प्रेम का प्रतीक न होती, मैं किसी कलाकार की विषयवस्तु न होती, मैं किसी वैज्ञानिक की सामग्री न होती, मैं किसी मन्दिर में न होती। मैं सहस्तर के भयावह दुरूह तट पर खड़ी ऐन अपनी जड़ों पर होती।

काश मैं सहस्तर का फूल होती।

ज्योत्स्ना शर्मा


जलसा 2010 (अधूरी बातें) में संकलित

Sunday, November 27, 2011

यह तो कुमार विकल को भी नहीं पता था

हम नाहक़ दोस्तों को कोसते रहे

यह तो कुमार विकल को भी ठीक ठीक नहीं पता था
कि वह पीता क्यों था
हम नाहक़ दोस्तों को कोसते रहे
पीने के वजहें सबसे अधिक तब मिलती हैं
जब पास कोई न हो
अनजान किसी ग्रह से वायलिन की आवाज़ आती है
आँखों में छलकने लगता है जाम
उदास कविताएँ लिखी जाती हैं
जिन्हें बाद में सजा धजा हम भेज देते हैं
पत्रिकाओं में
कोई नहीं जान पाता
कि शब्दों ने मुखौटे पहने होते हैं
मुखौटों के अंदर
रो रहे होते हैं शब्द ईसा की तरह
सारी दुनिया की यातनाएँ समेटे।

लिख डालो, लिख डालो
बहुत देर तक अकेलापन नहीं मिलेगा
नहीं मिलेगी बहुत देर तक व्यथा
जल्दी उंडेलो सारी कल्पनाएँ, सारी यादें
टीस की दो बूँदें सही, टपकने दो इस संकरी नली से
लिख डालो, लिख डालो।
बहुत देर तक बादल बादल न होंगे
नहीं सुनेगी सरसराहट हवा में बहुत देर तक
जल्दी बहो, निचोड़ लो सभी व्यथाएँ, सभी आहें
अभ्यास ही सही, झरने दो जो भी झरता स्मृति से
लिख डालो, लिख डालो।

लाल्टू
--


जलसा 2010 (अधूरी बातें)
में संकलित

देवी प्रसाद मिश्र की एक कविता

बीज

मैंने प्लेट में टमाटर के ऐसे टुकड़े देखे
जो मैंने पहले कभी नहीं देखे थे मतलब
कि ऐसे कि जैसे ताज़ा ख़ून से भरे हों
उनका वलय भी बड़ा था उनके बीज भी
मोतियों सरीखे थे मेरे मेज़बान ने उन
टुकड़ों को मेरी प्लेट में रख दिया मैंने
महसूस किया कि इस आदमी के हाथ
बहुत बड़े हैं इतने कि वह मेज़ के आरपार
अपना हाथ ले जा सकता है और चाहे तो
मेरी गर्दन भी पकड़ सकता है वह इतना लंबा है
कि मेरे सिर पर अपनी प्लेट रख कर
अपना खाना खा सकता है मैंने टमाटर
के टुकड़ों को थोड़ा दहशत के साथ देखते
हुए कहा कि आप के हाथ बहुत लंबे हैं तो
उसने थैंक यू कहा - यह लगा कि उसने
मुझे डाँटा मतलब कि उसकी कृतज्ञता में
सपाटता थी और उसने बहुत बेरुख़ी से
बताया कि वह एक मल्टीनेशनल में
सेल्ज़ में है और फिर वह मुझे इस तरह
देखता रहा कि जैसे वह यह बताना चाहता
हो कि मेरे कितने कम दाम लगेंगे

जिस टमाटर से यवतमाल के किसान का ताज़ा ख़ून
जैसा रिस रहा था उस टमाटर के बारे में
उसने बताया कि यह जेनेटिकली मॉडीफ़ाइड बीज
वाला टमाटर है जिसके बीज अमेरिका में
तैयार किये गये हैं जान यह पड़ता था कि
बहुत लंबे हाथों वाला वह आदमी भी ऐसे ही
किसी बीज से पैदा हुआ था जिसे विकसित
करने में अमेरिका ने बरसों मदद की हो

--

जलसा 2010 (अधूरी बातें) में संकलित

Thursday, June 9, 2011

एक निधन


जलावतनी में मौत

मक़बूल फ़िदा हुसेन के निधन से न सिर्फ़ हिन्दुस्तान ने बल्कि एशिया ने अाधुनिक इतिहास का अपना सबसे बड़ा कलाकार खो दिया है। भारतीय उपमहाद्वीप की कला को उन्होंने एक नई अस्मिता अौर नया अात्मविश्वास दिया। उनके काम में से एक नहीं अनेक रास्ते निकलते हैं। समकालीन भारतीय कला में शायद ही कोई पहलू या मुद्रा ऐसी हो जिसका अारंभ या पूर्वाभास हुसेन में न मिलता हो। हुसेन भले ही चले गए हों, हुसेन युग जल्दी ख़त्म नहीं होने वाला है।

पिछले १५ साल से वह निर्वासित कलाकार का जीवन जी रहे थे, वह अब निर्वासन सदा के लिए स्थायी हो गया है। लाख चाहने के बावुजूद वह अपने वतन वापस न अा सके, जलावतनी में उनकी मौत हुई। कोई बेहिस ही होगा जिसे यह ख़बर सुनकर बहादुरशाह ज़फ़र की याद न अाई हो। रंगून की उस मौत अौर लंदन की इस मौत के बीच हालात का जो भी फ़र्क़ हो - अौर डेढ़ सौ साल का गंभीर फ़ासला - हमारे हिन्दुस्तानी फ़ासिस्टों ने, अौर उनके तुष्टिकरण में मसरूफ़ भारतीय राज्य ने, मिटाकर रख दिया है। इस मामले में भारतीय कला-जगत के दामन पर भी कम दाग़ नहीं हैं।

हुसेन को जहाँ दफ़नाया गया है, वह जगह पता नहीं लंदन की हाईगेट सिमिट्री से कितनी दूर है जहाँ उन्नीसवीं सदी का सबसे मशहूर नागरिकता-विहीन निर्वासित शख़्स, कार्ल मार्क्स, दफ़न है। यक़ीनन दो क़ब्रों बीच बहुत दूरी न होगी। मौत के बाद अब वह निर्वासित मनुष्यता की उस सार्वभौमिक जगह में दाखिल हो गए हैं जहाँ उनका साथ देने को पाब्लो पिकासो, नाज़िम हिकमत अौर सेसर वायेख़ो पहले से मौजूद हैं।

अब अचानक हमारे फ़ासिस्ट माँग कर रहे हैं कि हुसेन को भारत लाकर दफ़नाया जाए! सुनकर अाश्चर्य होता है। शायद वे एक मौक़ा अौर चाहते हैं, ताकि हुसेन की क़ब्र या स्मारक के साथ वही सुलूक कर सकें जो उन्होंने नौ साल पहले गुजरात में वली दकनी के मज़ार के साथ किया था।

ऐसे में ग़ालिब ही याद अाते हैं : मुझको दयारे ग़ैर में मारा वतन से दूर / रख ली मिरे ख़ुदा ने मिरी बेकसी की शर्म।

Thursday, November 18, 2010

कुछ बातें / अवाँ गार्दिज़्म - 4 . प्रमोद कौंसवाल के बहाने


हिंदी के युवा कवि प्रमोद कौंसवाल का पहला कविता संग्रह 90 के दशक में आया था. उसका नाम था अपनी ही तरह का आदमी. आसमानी नीले रंग के कवर वाली इस किताब पर अंगूठे की छाप सजाई गई थी, पीछे के फ़्लैप पर कवि परिचय के साथ कवि का एक स्केच था जो ऊबड़खाबड़ सा था और उसमें बाल चश्मा चेहरा अलग अलग ज्यामितियां बनाते थे. संग्रह के नाम और इस फ़ोटो में कुछ संगति सी दिखती थी.


1991 में आई उन कविताओं ने उस दौरान हिंदी में बड़ा ध्यान खींचा. वे एक अलग स्वाद की कविताएं थीं और उनमें मुक्तिबोध, धूमिल, राजकमल चौधरी, ज्ञानरंजन, रघुबीर सहाय, विष्णु खरे की आवाजाही दिखती थी. ताज्जुब न करें कि उनकी ताज़गी की महक क़ायम है.


प्रमोद कौंसवाल की कविताएं हिंदी में जितनी तीव्रता से याद की गईं कमोबेश उतनी ही तेज़ी से उन्हें भुलाने के उपक्रम भी हुए. रुपिन सूपिन के साथ फिर वो सामने आए लेकिन उस समय हिंदी की दुनिया उनका वैसा स्वागत करने के लिए तैयार नहीं जान पड़ी. ऐसा क्यों हुआ इसकी भी छानबीन की ज़रूरत है.


बहरहाल कहना ये है कि प्रमोद की कविता धूल गुबार उड़ाने वाली, चुभने वाली, फटकार, संशय और संताप से भरी हुई और चीख वाली कविता रही है.


इसी ब्लॉग में एक लेख है जिसमें मंगलेश डबराल ने रघुबीर सहाय की कविता के हवाले से नोट किया है कि ताक़त ही ताक़त के ख़िलाफ़ सामर्थ्य से बोलने वाली आवाज़ें एक यथास्थितिवादी ख़ामोशी में सिमट गई हैं. रघुवीर सहाय की कविता में व्यक्त ‘ताकत ही ताकत’ पिछले डेढ़ दशक में कहीं अधिक व्यापक रूप ले चुकी है और हम उसके ख़िलाफ़ चीखना भूल रहे हैं.


प्रमोद कौंसवाल लेट एटीज़ या नब्बे के दशक की शुरुआत की उसी जमात के कवि हैं जहां इस तरह की चीखें आ रही थीं. और ये महज़ चीखने के लिए चीखना जैसा नहीं था.


यही वो दौर था जब मुक्त बाज़ार का दानव बढ़ा चला आ रहा था और भारत की सत्ता राजनीति उसकी छाया के नीचे आधे नमन आधी दहशत में हिचकोले सी खाती हुई खड़ी थी. मध्यवर्गीय समाज के नलों से उपयोगितावाद बहने लगा था और जैसा कि प्रमोद की कविता में है कि हिंदू हिंदू कहना चिल्लाना हो गया था.


अब मेरा संशय है कि प्रमोद कौंसवाल हिंदी की युवा कविता में जिस स्वर के प्रतिनिधि हैं उसे अवांगार्द कहना चाहिए या नहीं. अवांगार्द के लिए अवांगार्द होना करना तो ठीक नहीं होगा. अगर अवांगार्दिज़्म के पैमाने पर उन्हें परखें तो क्या वो अवांगार्द अवांगार्द होते होते निकलेंगें या वो कोई और ही धज होगी. उन्होंने अपनी ही तरह का एक बीहड़ जीवन बिताया है जिसमें धूल धिक्कार प्रताड़ना तारीफ़ सम्मान बहक दुर्घटना नौकरी सबकुछ शामिल है. टिहरी दिल्ली मेरठ चंडीगढ़ फिर दिल्ली नोएडा की खाक छानी है. वो अपनी ही कविता के एक लुटेपिटे हैरान से थकान से चूर खून और गर्द से भरे चेहरे वाले आदमी सरीखे हैं.


मैं इसी बेवक़्त कहे जाने वाले समय का ग़वाह बना
और आप जानते ही हैं
दृश्य में दिखा भी नहीं।


गुस्सा ऊब चिढ़ ये सब क्यों नहीं है कविता में, ये उन्होंने अपनी एक कविता में पूछा भी था. उनके चेहरे पर पहाड़ और मैदान का उबड़खाबड़पन है, कहने को बड़ा सौम्य कमसिन चेहरा उनका रहा है. वो एक नंबर के ज़िद्दी हैं. उनमें रूसी उपन्यासों के नायकों जैसी अजीबोग़रीब फ़ितरत है. यानी एक फ़लसफ़ाई बेचैनी, संदेहवाद, आशंका, अंतर्द्वंद्व, विरोधाभास, झक्कीपना, असहमति, दो टूक सा रवैया.


और एक ललकार या एक हुंकार भी वहां है जो भीतर तड़कती है और वहीं गिर जाती है. कविता में उसके तपते हुए छींटे गिरते रहते हैं. तारों का जैसा विस्फोट भौतिकी में नुमायां होता है वैसा प्रमोद कौंसवाल की कविता में आया है.


मैंने दलित को दलित नहीं
काफी ग़रीब और कुचला हुआ कहा
मैंने भारत की संसद के बाहर जाकर
खाक़ उड़ाई और हिंदू-हिंदू कहता हुआ
अपने को ही गालियां देकर
शर्म की पोटली लेकर
लौट आया.


यूं तो कोई अवांगार्द कहलाना पसंद न करे या ख़ुश हो, लेकिन कुछ अलग क़िस्म का रच देने वाले विरल मौकों पर शायद अवांगार्दिज़्म का बड़ा योगदान है. अलग और महत्त्वपूर्ण. असद ज़ैदी के कहे मुताबिक संगीत के दुर्लभ मक़ाम को हासिल कर लेने वाला क्षण.


तो इस लिहाज़ से जो अवांगार्द नहीं भी है वो अपनी कहन और अपनी रचना से ऐसा हो सकता है या ऐसी धारा को रिप्रज़ेंट करता हुआ दिख सकता है. ये वही बात है कि मुख्यधारा से अवांगार्दिज़्म फूटे और फिर उसी में धीरे धीरे समाने लगे. टकराते हुए आए और टकराता हुआ लौटे. अवांगार्दिज़्म की मानो यही ख़ूबी है कि वो मंच बनाता सजाता है और फिर उस मंच की सीमाएं तोड़ देता है. वो मंच से नीचे उतर आता है.


खैर. हम प्रमोद कौंसवाल की कविता की चर्चा कर रहे थे. क्या ये उनका अवांगार्दिज़्म ही है जो सीना ठोंककर कहता है, मै क्यों आत्ममुग्ध.


मैं मुग्ध हूं अपने पर
नहीं हो पाया मोहमंग मुझसे ही मेरा

कोई सुनना पसंद नहीं करता ऐसा कवि मैं
कोई नौकरी नहीं देना चाहता ऐसा नौकर
बात नहीं करना चाहता ऐसा वार्ताकार
आंखें नहीं मिलाना चाहता इस तरह का मिलनसार
मेरे सच पर यकीन नहीं करना चाहता
सुनना नहीं चाहता मुझे कोई ऐसा पुजारी


अब इस आत्मफटकार या इस दुख भरी आत्ममुग्धता को आप अवांगार्दिज़्म का एक विकट संकट कहिए या कवि के हवाले से उसका अपना या उसके समाज का संकट. आप ये भी पूछ सकते हैं कि भला इसे अवांगार्दिज़्म कहें ही क्यों. एक सवाल ये है कि हिंदी कविता में अगर कुछ सच्चे अवांगार्द सरीखा है तो उसकी सबसे ज़्यादा चहलपहल कौन से दौर में है. कौन सी पीढ़ी में है.


शिवप्रसाद जोशी

Thursday, November 11, 2010

कुछ बातें / अवाँ गार्दिज़्म – 3. शकीरा शकीरा


अब मैं कुछ और अलग चीजों की तरफ़ ध्यान खींचना चाहता हूं. मेरे ज़ेहन में शकीरा का नाम आता है. यूं तो उनका एक ताज़ा एल्बम आ गया है लेकिन मेरा ध्यान इस समय उनके विश्व कप फ़ुटबॉल 2010 के वाका वाका नृत्य पर है.


शकीरा ने रोमान, संस्कृति, कला और तकनीक की जिन ऊंचाइयों के साथ वो नृत्य किया है और वो गीत गाया है, वो अद्भुत है. लय और गति का वैसा नैसर्गिक आवेग नहीं दिखता. जैक्सन के पास भी वो नहीं थी. प्रिस्ले में भी एक अवाँगार्दियन खिंचाव था लेकिन शकीरा इन सबसे और अपने समकालीनों से आगे नज़र आती हैं.


अभी मुझे ऐसा लग रहा है कि अवांगार्द की अभी तक की बातें उन्हीं चीज़ों के इर्दगिर्द घूम रही हैं जिनका ज़िक्र असद जी ने बहस की शुरुआत में किया था.


हॉकिंग के मसले पर देवी जी ने जो बातें लिखी हैं उनसे अवाँगार्द की जटिलता के कुछ तंतु सुलझते दिख रहे थे कि तभी मुझे ओरहान पामुक का ख़्याल आ गया.


इस्ताम्बुल को इस लेखक ने अपनी फ़कीराना तबीयत के साथ महसूस किया है. हालांकि वहां एक सजा सजाया अवाँगार्द भी है. 'स्नो' के मुक़ाबले क्या इसी वजह से 'म्युज़ियम ऑफ़ इनोसेंस' एक कमज़ोर उपन्यास तो नहीं. जबकि पामुक अगर इस म्युज़ियम को ज़रा और बिखरा हुआ और मोहब्बत की निशानियों को और छितरा छितरा कर चलते तो शायद ये ज़्यादा बड़ा उपन्यास हो जाता. क़रीब क़रीब जैसे 'मास्टर और मार्गरीता' में है. पता नहीं. ये एक सवाल है मेरे मन में.


पामुक के 'स्नो' का नायक अंततः एक लुटापिटा अवांगार्द है. लहुलूहान 'म्युज़ियम ऑफ इनोसेंस' का नायक भी है लेकिन उसके ज़ख़्म ज़रा पहले देख लिए गए जान पड़ते हैं. कभी कभी ऐसा लगता है कि अफ़सोस और तक़लीफ़ें और वेदनाएं क़रीने से आ रही हैं और म्युज़ियम में जा रही है.


अवाँगार्द कला की हमारे समय की एक बड़ी प्रतिनिधि पीना बाउष को देखिए. जर्मनी की इस महान नृत्यांगना का पिछले साल देहांत हुआ. अपनी नृत्य संरचनाओं से एक अवांगार्द रचने वाली बाउष का बार बार यही सवाल था कि लोग थिरकते कैसे हैं कि बजाय वो ये जानना चाहती हैं कि वे थिरकते क्यों हैं.


ख़ैर. हम शकीरा पर लौटते हैं. कई गायक स्टेज से परे तेज़ रोशनियों पर निगाहें गड़ा लेते हैं ताकि भीड़ की निगाहों का सामना न करना पड़े. माइकल जैक्सन कहते थे कि उन्हें भीड़ विचलित कर देती है. उन्हें भीड़ से डर लगता था. इसलिए वो स्टेज पर तमाम रोशनियां अपने ऊपर लेते थे. शकीरा इसका ठीक उल्टा करती हैं. वो अपने तकनीशियनों से कहती है कि दर्शकों पर सबसे तेज़ रोशनियां डालें ताकि वो उन्हें देख सकें. तभी संवाद पूरा होता है. मार्केज़ के एक लेख में दर्ज बातचीत में वो कहती हैं कि गाते हुए उन्हें लोगों की आंखों में देखना अच्छा लगता है. कभी कभी वो भीड़ में ऐसे चेहरे देखती है जिन्हें उसने कभी नहीं देखा होता लेकिन वो उन्हें पुराने दोस्तों की तरह याद करती है. एक बार तो उसने एक ऐसे आदमी को पहचान लिया जो कब का मर चुका था. एक बार उसे ऐसा महसूस हुआ जैसे कोई उसे किसी दूसरे जन्म के भीतर से देख रहा हो. शकीरा ने कहा कि वो पूरी रात उसी के लिए गाती रही.


शकीरा का वाका वाका गीत उन लातिन अमेरिकी अफ़्रीकी रोमानों की अथाह गोलाइयों में थिरकता रहता है जिनके अलग अलग प्रतिनिधि इस गीत में शकीरा के साथ शामिल हैं.


शकीरा के इस गीत में कोई व्यवस्था नहीं है, अगर आप बारीकी से देखेंगे तो लगता है कोई तैयारी भी नहीं है.(यूं तकनीक और संपादन का ये एक विरल टुकड़ा है.) लेकिन शकीरा जिन भटकावों और हलचलों के बारे में और जिन भटकावों और हलचलों के लिए गाती हैं वो ही वो नुमायां है वहां. वे न जाने कितनी तड़पती भटकती पछाड़ें खातीं झूमती नाचती आत्माएं हैं कितने प्रेत कितने जिस्म हैं. शकीरा अपने नृत्य में तमाम कलात्मक वैज्ञानिक सांस्कृतिक अनुभव संभव कराती हैं.


क्या शकीरा हमारे समय की सबसे करामाती अवांगार्द हैं. जहां कला विज्ञान चिंतन लेखन कविता संगीत नृत्य जीवन सामाजिकताएं सभ्यताएं संस्कृतियां अस्मिताएं घुलीमिली आती हैं और बारी बारी से या एक साथ शकीरा की नृत्य भंगिमाओं से झरती रहती हैं.


अपने गाने की बिंदास ऊबड़ खाबड़ ज़मीन और अपने नाच की विलक्षण मादकता में जो ऐंद्रिक अनुभव शकीरा के ज़रिए संभव होता है वह उन्हें अपने चाहने वालों की नज़र में सबसे ख़ास बनाता है. शकीरा का ये गाना दुनिया के समस्त अवाँगार्दों के लिए एक आह्वान गीत सरीखा हो सकता है. इसे महज़ एक खेल का प्रमोशन या थीम गीत न माना जाए.


शकीरा के बाद अवाँगार्द के एक और बिंदु पर मैं अपने संशय और दुविधाएं और कुछ मालूमात आप लोगों के साथ शेयर करना चाहूंगा. वो बिंदु अपनी ही तरह के आदमी यानी प्रमोद कौंसवाल की कविता का है, संयोग से जो इस बहस में शामिल दो कवियों देवीप्रसाद मिश्र और लाल्टू के समकालीन भी हैं. तब तक शकीरा और अन्य महानुभावों के हवाले से अवाँगार्द को समझने में कृपया मदद करें.


शिवप्रसाद जोशी

Tuesday, November 9, 2010

कुछ बातें / अवाँ गार्दिज़्म - 2. संगीत और भौतिकी


संगीत और भौतिकी के ये अवांगार्द


संगीत के बारे में असद ज़ैदी की टिप्पणी के संदर्भ में ख़्याल आता है भौतिकी का. उसमें भी कॉस्मोलॉजी को लें. आइन्श्टाइन जिस चीज़ पर ठिठक गए थे उसे उनके बाद यूं तो कई बुलंद वैज्ञानिकों ने रह रह कर उठाने समझाने की कोशिश की लेकिन उस बात को सबसे स्पष्ट तार्किकता और खरी ज़िद के साथ कहने वाले निकले स्टीफ़न हॉकिंग. ईश्वर पासे नहीं खेलता कि आइन्श्टाइन की बात पर हॉकिंग ने कहा कि वो सिर्फ़ खेलता है बल्कि उन्हें ऐसी जगह बिखेर भी देता है कि वे ढूंढें नहीं मिलते. ईश्वर की खिल्ली उड़ाने का इरादा दोनों महानुभावों में से किसी का भी नहीं था. लेकिन ब्रह्मांड के रहस्यों को नापने के लिए अपना फीता लेकर जाने का उन्हें कोई बहुत शौक रहा होगा. खैर...


आइन्श्टाइन तोड़फोड़ मचाने से ज़रा घबराए आख़िर में लेकिन हॉकिंग अपनी उस लगभग मिथकीय हो चुकी लटकी हुई गर्दन और उस विख्यात इलेक्ट्रॉनिक चेयर पर बैठे हुए ऐसे ऐसे फ़लसफ़े ला रहे हैं कि ब्रह्मांड को समझने के औजार खुलने के साथ ही पुराने से पड़ते हुए दिखते हैं. हॉकिंग का संगीत ज्ञान आइन्श्टाइन के संगीत ज्ञान से ज़ाहिर है आगे का रहा है. मोत्सार्ट पर उनकी विलक्षण पकड़ है. संगीत को वो भौतिकी का भीतर का कमरा मानते हैं. पहल–90 (इसके बाद ही ज्ञानजी ने पहल बंद करने की सूचना सबको रवाना की थी) में हॉकिंग के एक इंटरव्यू का अनुवाद था. उसमें हॉकिंग ने जो कहा वो कला की उन उद्दाम ऊंचाइयों की झलक भी दिखाने की कोशिश करता था जहां संगीत और भौतिकी जैसी दो जटिल दुनियाएं एक बिंदु पर थिरकती रहती हैं.


हॉकिंग ज़ाहिर है उसी बिंदु की तलाश में कुर्सी पर बैठे बैठे भटक रहे हैं. आइन्श्टाइन अपने आखिरी दिनों में सिर्फ़ अपने फ़लसफ़े को सही ठहराने की कोशिश कर रहे थे बल्कि वो एक समांतर, समांतर से ज़्यादा बहुत बैचेनी और कामना के साथ कोशिश ये कर रहे थे कि अनिश्चितता के सिद्धांत को सही ठहराने वाला कोई सूत्र देते जाएं. वो ख़ुद को ही झुठलाने को तीव्रता से बेताब थे. कोई नहीं जान सकता कि आइन्श्टाइन जब गए तो खालीपन के कितने भयानक अंधकार के साथ. वो बहुत ज़िद्दी थे. अड़े रहे. ब्रह्मांड एक अदृश्य नियमावली से बंधा है, आइन्श्टाइन ये नहीं मानते हुए जाना चाहते थे.


लेकिन उन्होंने यही माना, वो संगीत के उस आखिरी नोट पर रुक गए कि इस नोट के बाद फिर से शुरू करना पड़ेगा. वो जिसे ख़त्म करना चाहते थे पर वो जारी था. संगीत वॉयलिन के तारों पर नहीं उठा तो वो ख़त्म नहीं हुआ. वो कहां पर ठिठका हुआ है, हॉकिंग ने इसे पकड़ लिया. यही उनकी करामात है. इस तरह हॉकिंग ने भौतिकी और संगीत दोनों की जटिलता के नोट तैयार किए.


ब्रह्मांड भौतिकी के वो अवांगार्द है. सोचिए एक अवांगार्द अपनी क़िस्म के आइन्श्टाइन थे जो साइंस की एक अविश्वसनीय झक में घर का पता भी भूल सकते थे और ख़ुद को भी. और एक अवांगार्द हॉकिंग हैं जिनकी इस मोटर न्यूरान बीमारी को देखते हुए चिकित्सा के धुरंधरों ने कह दिया था कि अव्वल तो वो जीवित नहीं बचेंगें और अगर बच गए तो संतान तो कभी नहीं पैदा कर पाएंगें. हॉकिंग के तीन बच्चे हैं और अब तो वो नाती पोतों वाले हैं. अपनी ज़िंदगी के क़रीब तीसरे दशक से कुर्सी पर बैठा एक इंसान आख़िर कौन होगा. वो तो कोई जिद्दी अवांगार्द ही होगा. और किताबें लिखता रहता होगा और चर्च और धर्म और पारंपरिक विज्ञान को तंग करता रहता होगा.


ये भी नोट करने वाली बात है कि इन वैज्ञानिकों के उत्पाती मिज़ाज को बाज़ार की शक्तियां नहीं नाथ पाई हैं. हॉकिंग तो एक बार ऐसे प्रयोग में जा घुसे जहां उन्हें शून्य गुरुत्व का अहसास दिलाया जाना था. मेरे विचार में ये शायदएस्थेटिक पोज़ीशननहीं होगी. उनका अवांगार्द ही है जो नोबेल वालों की अभी उनपर कोई दृष्टि नहीं जा रही. पर अगली बार उन्हें संयोग से नोबेल मिल जाए तो आप ये कहें कि अब काहे का अवांगार्द. उन्हें नोबेल मिलने दीजिए फिर उनके नोबेल भाषण का इंतज़ार कीजिए.


शिवप्रसाद जोशी 9.11.2010

Saturday, November 6, 2010

कुछ बातें / सांस्कृतिक बाज़ारवाद

कविता के लिए यह वाकई कठिन दौर है क्योंकि अस्वीकार, विरोध और प्रतिरोध के मोर्चे पर वह लगभग अकेली है। कोई पैंतीस साल पहले रघुवीर सहाय ने एक कविता में कहा था ‘एक और ही युग होगा जिसमें ताकत ही ताकत होगी और चीख न होगी।’ यह एक तरह से भविष्य-कथन था जिसका सच आज बहुत अधिक महसूस होता है जब हम खुद को ताकत के वििभन्न और भयावह तंत्रों के घिराव में पाते हैं। अमेरिका, बहुराष्ट्रीय निगम, उपभोक्ता बाजार, गैर-उत्पादक क्रय-विक्रय तंत्र और मीडिया इस शक्ति सरंचना के प्रमुख घटक हैं जिन्होंने मनुष्य को नये सिरे से इतना पराधीन बना दिया है कि वह चीखने में असमर्थ है, कोई शिकायत नहीं करता और यह भी जान गया है कि गुलामी के अपने मजे हैं। इसके साथ यह दुर्घटना भी हुई है कि भारतीय अंग्रेज़ी उपन्यास की तरह हिंदी साहित्य मीडिया के बहुत पास आ गया है, लगभग उसका हिस्सा बन रहा है और उसमें अस्वीकार करने, प्रतिपक्ष की भूमिका निभाने की नैतिक चेतना काफी कम हो चली है। जाने-अनजाने वह मीडिया की दो प्रमुख विशेषताओं - यथास्थिति और मनोरंजन-धर्मिता - को अपना रहा है, यथार्थ के अनुभवों को तटस्थ और निस्संग तरीके से दर्ज कर रहा है लेकिन उसमें ‘नैतिक अस्वीकार’ की प्रवृत्ति तेजी से कम हो रही है। रघुवीर सहाय की कविता में व्यक्त ‘ताकत ही ताकत’ पिछले डेढ़ दशक में कहीं अधिक व्यापक रूप ले चुकी है और हम उसके खिलाफ चीखना भूल रहे हैं। आधुनिक मीडिया राजनैतिक घटनाओं के विवरण भी गैर-राजनीतिक और सनसनीखेज स्तर पर पेश करता है और चीखने या प्रतिरोध करने की प्रेरणा नहीं देता। आज का अधिकतर गद्य साहित्य इसी राह पर चलता दिखाई देता है और कविता भी उससे अछूती नहीं रह पायी है। पिछले दिनों एक युवा कवि की एक कविता की काफी चर्चा हुई जिसमेें इस आशय की पंक्तियां थीं कि कार्ल मार्क्स एक बंद कारखाने के अहाते में उगे हुए पीपल के पेड़ की तरह हैं जहां हम कभी कभी चले जाते हैं और अनुष्ठान की तरह पानी चढ़ा आते हैैं। इस कविता में व्यक्त अनुभव की सच्चाई और यथास्थिति की ईमानदारी पर संदेह भले न किया जाये लेकिन उसमें कोई नैतिक अस्वीकार नहीं दिखता। शायद हमारी या हमसे पहले की, प्रगतिशील विचारों से संचालित पीढ़ियां यह नहीं लिख सकती थीं। जाहिर है, ऐसी पंक्तियां सांस्कृतिक बाजारवाद और मीडिया के समय में ही संभव थीं।

इस सांस्कृतिक बाजारवाद का एक रूप कविता से लोकप्रियतावादी मांगों की शक्ल में प्रकट हो रहा है। कुछ आलोचकों और कवियों ने यह कहना शुरू कर दिया है कि हमारी कविता जटिल दुर्बोध है और उसमें सरलता उपलब्ध करने के लिए छंद की वापसी होनी चाहिए। ऐसी लोकप्रियतावादी अपेक्षाएं युवा कविता के लिए भ्रामक और खतरनाक ही साबित होंगी क्योंकि छंद की वापसी का आग्रह दरअसल निहायत रूपवादी है जो हमें फिर से लोकजीवन के घिसे-पीटे-पिलपिले बिंबों, गीत गजल (वह भी हिंदी), गेयता, मुक्तक और फिल्मी गानों की तरफ और इस तरह कविता के तरलीकरण - डायल्यूशन - की और ले जायेगा और इसमें कोई नयी बात कतई नहीं होगी क्योंकि हिंदी काव्य पहले से ही गीत-नवगीत आदि के दुष्परिणामों के इतिहास से भरा हुआ है। छंद के नये प्रयोग अगर नागार्जुन और त्रिलोचन की बहुत सारी कविताओं, रघुवीर सहाय की ‘रामदास’ और कुंवर नारायण ‘कांधे धरी यह पालकी’ से आगे नहीं जाते हैं तो वे कविता के काम के नहीं हो सकते। अच्छी छंदहीनता खराब छांदिकता से कहीं बेहतर है और लोकप्रिय कवि लोकप्रिय कविता से कहीं अधिक जरूरी हैं। कविता की तुरंत समझ आ जाने वाली लोकप्रियता की मांगें बाजार के विस्तार के साथ बढ़ने लगी हैं, लेकिन कवि की लोकप्रियता से किसी को सरोकार नहीं है। यहां हम शमशेर बहादुर सिंह को याद कर सकते हैं। उनकी कविता दुरूह है इसलिए अलोकप्रिय मानी जाती है और इस मान्यता के प्रचार में आलोचकों का भी हाथ है। लेकिन शमशेर मनुष्य के रूप में लोकप्रियतावादी कविता या गीत लिखने वाले कवियों से कहीं अधिक लोकप्रिय थे - हालांकि कविता की कठिन शर्तों से डिगने को तैयार नहीं थे।

मंगलेश डबराल सितम्बर 2010
कथादेश से साभार

Thursday, October 28, 2010

कुछ बातें / अवाँ गार्दिज़्म - 1

अवाँ गार्दिज़्म की एक समस्या मुझे लंबे अरसे से परेशान करती रही है : कि अवाँ गार्द का हमेशा अवाँ गार्द बने रहना संभव नहीं होता.

कला में बुनियादी प्रेरणा या ईमान को नए सिरे से खोजने या ईजाद करने की ज़रूरत तब पड़ती है जब प्रचलित कलात्मक पद्धतियाँ अपने समय की शक्ति-संरचना और कामनसेंस के साथ घुल-मिल कर अपना मूलगामी ईमान खो बैठती हैं. वह कला की जगह उपभोग और सुरक्षित निवेश की वस्तु लगने लगती है. उनमें चुनौती की जगह समझौता और चौतरफ़ा समझदारी और मसलेहत ही दिखाई देने लगती है. ऐसे दमघोंटू मध्यवर्गीय माहौल में पुराने बाग़ी कलाकार और उत्साही नई प्रतिभा का खुलकर साँस लेना मुश्किल हो जाता है. वे बग़ावत करते हैं, रिस्क लेते हैं, भले ही इस प्रक्रिया में वे मुख्यधारा से बाहर हो जाएँ.

मुख्यधारा से बाहर जाकर, बल्कि हाशिये से भी बाहर जाकर किया गया काम भी देर-सबेर मुख्यधारा को प्रभावित करने लगता है और अवाँ गार्द के भी दूल्हा बनने की बारी आ जाती है. (बिना विडम्बना के तो न संस्कृति का कोई गुज़र है, न प्रति-संस्कृति का.) इसे कला और साहित्य की दुनिया में पाई जाने वाली एक जीवन शैली समझ लिया जाता है. ख़ुद लेखक और कलाकार ही ऐसा समझने लगते हैं. इस तरह एक सब-कल्चर और अवाँ गार्द का मिथ बनने लगता है. बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में और उससे ज़्यादा आज के दौर में अब अवाँ गार्द कला की एक स्वीकृत भंगिमा, एक कमसिन अदा है, और कई विधाओं में तो इसके भी पैसे मिलने लगते हैं. पूंजीवाद अवाँ गार्द को भी जल्दी ही वल्गराइज़ कर डालता है.

इसीलिए मैं समझता हूँ कि सच्चा अवाँ गार्दिज़्म एक ऐतिहासिक मजबूरी या उत्प्रेरणा या कम्पल्शन का नाम है, न कि किसी एस्थेटिक पोज़ीशन का.

अवाँ गार्दिज़्म की राजनीति और सामाजिक आशय को देखे बिना उसकी विश्वसनीयता और उसकी अहमियत को कैसे जानें! हालांकि सुनने में यह बड़ी रूढ़िवादी बात लगती है.

असद ज़ैदी 5.2.2009

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असद साब, यह टुकड़ा कमोबेश आपके पीस से पहले लिख लिया गया था । ज़ाहिर है इसे संवादात्मक ज़रूरत के मुतबिक़ तोड़ा फोड़ा जायेगा।

मैं ज़रा अवांगार्द को सेलेब्रेट करना चाहता हूं । अवां गार्द में असहमति को कहने की जो तड़प होती है – वह काफ़ी बुनियादी चीज़ है । अमूमन देखा यह गया है कि सांस्कृतिक सर्वसत्तावाद के दौर में अवांगर्द पनपता है । इसमें पोस्टर का जो मिज़ाज होता है,, जो एक आउटबर्स्ट होता है, छिन्नभिन्न करने की जो विकलता होती है, ज्वालामुखी का जो एस्थेटिक होता है वह काफ़ी काम कर जाता है । विद्रोही आत्माएं शिल्प का विचलन लेकर भी आती हैं । मेरे ख़याल से अवांगार्द विफलता का शिल्प है । अवांगार्द वाले फिदायिनों की तरह काम करते हैं । यह उत्पात की संस्कृति है जो प्रशासकों और व्यवस्थापकों की नींद तो हराम करती है। मेरे खयाल से यह मामूली बात नहीं है । समयांतर तो अवांगार्द ही बनाता है । सीमांत की बहस को वह बहुत जीवंत तरीक़े से उठा पाता है । अगर वह कोलैबरेशनिस्ट यथास्थितिवाद से उपजा है तो उसकी भूमिका ऐतिहासिक भी हो सकती है। मतलब कि सबवर्ज़न की ज़रूरत तो हर समय बनी रहती है और अगर अवां गार्द यही करता है तो यह बात तो हस्तक्षेपकारी हुई । विजयकुमार की इस बात में दम है कि अवांगार्द अंधी गली होता है जहां केवल रचनाकार का सेल्फ होता है। एक तरह से अपने को और अपनी अंतर्वस्तु को और अपने शिल्प को बहुत निहंग तरीक़े से बिना किसी बिचौलिया के आयत्त करने का दुस्साहस समझना चाहिये अवांगार्द को । अब यह बात कैसी भी लगे लेकिन विनोद कुमार शुक्ल एक चुप्पा अवांगार्द वाली परंपरा के जान पड़ते हैं । मतलब कि हर बार अवांगार्द का जाॅनर हमेशा आवाज़ करे यह ज़रूरी नहीं है । और मुक्तिबोध जो कर सके वह बिना अवांगार्द की स्पिरिट के नहीं कर सकते थे । उनके यहां जो अंधड़ है, जो तूफान है, जो असहमति है, और इस सब को कहने की जो क्षिप्रता है और एस्थेटिक को लेकर जो लापरवाही है उसके पीछे अवांगार्द की भूतग्रस्तता का आत्महंता स्केत्सोफ्रिनिक बल दिखता है । अज्ञेय कविता को जिस तरह से बहुत मैं में ले जाकर आत्महीन बना दे रहे थे उस समय मुक्तिबोध तारकोव्स्की के स्टाकर की तरह पूरे सीन में घूमते हैं – कि तुम्हारे इस सर्वानुमतिवाद को चलने नहीं दूंगा । उस समय मुक्तिबोध मानव बम की तरह सुलग रहे हैं । एक घायल पखेरू की तरह पूरे आकाश में चक्कर काट रहे हैं । सुविधाजनक कविता के प्रजातंत्र में यह अकेली नैतिकता का उज़ाड़ और विषण्ण है । रोना आता है । कि जैसे कोई कलेजे पर घूसे मार रहा हो – अकेले पड़े मुक्तिबोध के बारे में सोचकर ऐसा ही लगता है । इस कोलेबरेशनिस्ट पोएट्री की ऐसी कम तैसी कर दूंगा – यह कहते और करते से लगते हैं मुक्तिबोध। और कर भी दिया । मेरा यह कहना है कि अवांगार्द कोलेबरेशनिस्ट समकालीनता की उपेक्षा का शिकार होता है । कई बार वह ताउम्र आविष्कार की प्रयोगशाला में ही अपने उल्टे सीधे रसायनों की बू के बीच में ही पड़ा रह जाता है । मुक्तिबोध के अंधकार को रामजी राय ने जनता का अंधकार माना और ठीक ही लेकिन श्रीकांत वर्मा, निर्मल वर्मा और अशोक वाजपेयी उनकी आस्तित्विक व्याख्या करते हैं। कीजिये। रामविलास शर्मा भी यही करते हैं । मेरा कहना है कि मुक्तिबोध के अवांगार्द को पावर स्ट्रक्चर द्वारा कोआप्ट करने की जल्दबाजी और रणनीति हिंदी साहित्य का दिलचस्प हिस्सा है । इस हिस्से को जितना ही विखंडित किया जाय साहित्य में सत्ता को समझने के उतने ही टूल विकसित होंगे । मतलब कि अंतत हिंदू देवमाला में बुद्ध के विद्रोह को भी लपेट लिया जायेगा । लेकिन यह भी है कि इस तरह अवांगार्द मुख्यधारा को काफी मानवीय बना देता है । मुख्य धारा के सर्वसत्तावाद – हेजेमनी- में काफ़ी डेंट पड़ता है इस तरह से ।

यौन अराजकता के लिये बाज़ दफ़ा अवांगार्द को कोसा जाता है। लेकिन सामंती नैतिकता के परखच्चे उड़ाने के लिये जिन सिरफिरों की ज़रूरत होती है उसका सामान तो अवांगार्द ही जुटाता है । मिनट भर में वह नैतिकता के धूसर थान को रंग बिरंगे रिबनों में बदल देता है । हिंदी में अकविता वालों की इस भूमिका पर ध्यान जाना चाहिये। हिंदी में यौनिकता के बंद गलियारों में वे बहुत धड़ल्ले से गये । हिंदी में बनी जेल की कोठरियों के एक बड़े हिस्से को ढहाने में उन्होंने बड़ी मदद की । लेकिन इस सब के लिये उन्हें साहित्येतिहास में गालियां भी खूब खानी पड़ी । अवांगार्द दुस्साहसिकता के बार को बहुत ऊपर कर देता है । अमरता विमर्श की मुख्यधारा से उसका कम ही लेना देना होता है। इसलिये उनको याद करना काफ़ी ताक़त देता है ।

देवी प्रसाद मिश्र 14.2.2009

Tuesday, October 5, 2010

कुछ बातें / सिर्फ़ संगीत

अंत में सारी रचनात्मक विधाएँ संगीत की तरफ़ रुख़ करती हैं. अपनी ज़िंदगी की किसी न किसी मंज़िल पर उन्हें उस अहाते और उस मकान का तवाफ़ करने की तीव्र इच्छा होती है जहाँ का स्थायी मकीन सिर्फ़ संगीत है. सभी तरह के रचनाकार अपनी अपनी तरह से उस कैफ़ियत को हासिल करने के लिए लालायित होते हैं. इसके बिना उनका कलाकर्म अधूरा रहता है. रचनात्मक साहित्य का मामला ही लें : क्या छंद, तरन्नुम और तग़ज्जुल से या प्रभाववादी वाक्य लिखकर यह कैफ़ियत पाई जा सकती है? ऐसी कोशिश हमें उस मूल बिंदु से और दूर ले जाती है जहाँ संगीत दूसरी कलाओं से रू ब रू होता है. कोई वजह है कि ज्ञानरंजन अपनी विद्रोही और बेपरवाह सामाजिकता के साथ इस मक़ाम पर धड़धड़ाते हुए पहुँच जाते हैं और निर्मल वर्मा अपनी एकान्तिक सुर साधना और निजता के साथ कोशिश करते रह जाते हैं. असद 7.8.10

Friday, May 21, 2010

एक शुरूआत





जलसा का पहला संकलन असद ज़ैदी के सम्पादन में 19 मई 2010 को छपकर आया
और हिन्दी के साहिबे-ज़बान कवि और गद्यकार मंगलेश डबराल को
उनके जीवन के 62 साल पूरे होने पर पेश किया गया.


इस अंक में :

विनोद कुमार शुक्ल

चन्द्रकांत देवताले

लीलाधर जगूड़ी

अशोक वाजपेयी

ज्ञानेन्द्रपति

वीरेन डंगवाल

पाई चुइ यी (अनु. त्रिनेत्र जोशी)

नरेन्द्र जैन

तादेऊश रूज़ेविच (अनु. उदय प्रकाश)

मनमोहन

शुभा

कृष्ण कल्पित

देवीप्रसाद मिश्र

लाल्टू

योगेन्द्र आहूजा

कुमार अंबुज

सत्यपाल सहगल

निर्मला गर्ग

अजन्ता देव

रवीन्द्र त्रिपाठी

ज्योत्स्ना शर्मा

नीलेश रघुवंशी

पंकज चतुर्वेदी

शिवप्रसाद जोशी

प्रियम अंकित

शिरीष कुमार मौर्य