Thursday, November 18, 2010

कुछ बातें / अवाँ गार्दिज़्म - 4 . प्रमोद कौंसवाल के बहाने


हिंदी के युवा कवि प्रमोद कौंसवाल का पहला कविता संग्रह 90 के दशक में आया था. उसका नाम था अपनी ही तरह का आदमी. आसमानी नीले रंग के कवर वाली इस किताब पर अंगूठे की छाप सजाई गई थी, पीछे के फ़्लैप पर कवि परिचय के साथ कवि का एक स्केच था जो ऊबड़खाबड़ सा था और उसमें बाल चश्मा चेहरा अलग अलग ज्यामितियां बनाते थे. संग्रह के नाम और इस फ़ोटो में कुछ संगति सी दिखती थी.


1991 में आई उन कविताओं ने उस दौरान हिंदी में बड़ा ध्यान खींचा. वे एक अलग स्वाद की कविताएं थीं और उनमें मुक्तिबोध, धूमिल, राजकमल चौधरी, ज्ञानरंजन, रघुबीर सहाय, विष्णु खरे की आवाजाही दिखती थी. ताज्जुब न करें कि उनकी ताज़गी की महक क़ायम है.


प्रमोद कौंसवाल की कविताएं हिंदी में जितनी तीव्रता से याद की गईं कमोबेश उतनी ही तेज़ी से उन्हें भुलाने के उपक्रम भी हुए. रुपिन सूपिन के साथ फिर वो सामने आए लेकिन उस समय हिंदी की दुनिया उनका वैसा स्वागत करने के लिए तैयार नहीं जान पड़ी. ऐसा क्यों हुआ इसकी भी छानबीन की ज़रूरत है.


बहरहाल कहना ये है कि प्रमोद की कविता धूल गुबार उड़ाने वाली, चुभने वाली, फटकार, संशय और संताप से भरी हुई और चीख वाली कविता रही है.


इसी ब्लॉग में एक लेख है जिसमें मंगलेश डबराल ने रघुबीर सहाय की कविता के हवाले से नोट किया है कि ताक़त ही ताक़त के ख़िलाफ़ सामर्थ्य से बोलने वाली आवाज़ें एक यथास्थितिवादी ख़ामोशी में सिमट गई हैं. रघुवीर सहाय की कविता में व्यक्त ‘ताकत ही ताकत’ पिछले डेढ़ दशक में कहीं अधिक व्यापक रूप ले चुकी है और हम उसके ख़िलाफ़ चीखना भूल रहे हैं.


प्रमोद कौंसवाल लेट एटीज़ या नब्बे के दशक की शुरुआत की उसी जमात के कवि हैं जहां इस तरह की चीखें आ रही थीं. और ये महज़ चीखने के लिए चीखना जैसा नहीं था.


यही वो दौर था जब मुक्त बाज़ार का दानव बढ़ा चला आ रहा था और भारत की सत्ता राजनीति उसकी छाया के नीचे आधे नमन आधी दहशत में हिचकोले सी खाती हुई खड़ी थी. मध्यवर्गीय समाज के नलों से उपयोगितावाद बहने लगा था और जैसा कि प्रमोद की कविता में है कि हिंदू हिंदू कहना चिल्लाना हो गया था.


अब मेरा संशय है कि प्रमोद कौंसवाल हिंदी की युवा कविता में जिस स्वर के प्रतिनिधि हैं उसे अवांगार्द कहना चाहिए या नहीं. अवांगार्द के लिए अवांगार्द होना करना तो ठीक नहीं होगा. अगर अवांगार्दिज़्म के पैमाने पर उन्हें परखें तो क्या वो अवांगार्द अवांगार्द होते होते निकलेंगें या वो कोई और ही धज होगी. उन्होंने अपनी ही तरह का एक बीहड़ जीवन बिताया है जिसमें धूल धिक्कार प्रताड़ना तारीफ़ सम्मान बहक दुर्घटना नौकरी सबकुछ शामिल है. टिहरी दिल्ली मेरठ चंडीगढ़ फिर दिल्ली नोएडा की खाक छानी है. वो अपनी ही कविता के एक लुटेपिटे हैरान से थकान से चूर खून और गर्द से भरे चेहरे वाले आदमी सरीखे हैं.


मैं इसी बेवक़्त कहे जाने वाले समय का ग़वाह बना
और आप जानते ही हैं
दृश्य में दिखा भी नहीं।


गुस्सा ऊब चिढ़ ये सब क्यों नहीं है कविता में, ये उन्होंने अपनी एक कविता में पूछा भी था. उनके चेहरे पर पहाड़ और मैदान का उबड़खाबड़पन है, कहने को बड़ा सौम्य कमसिन चेहरा उनका रहा है. वो एक नंबर के ज़िद्दी हैं. उनमें रूसी उपन्यासों के नायकों जैसी अजीबोग़रीब फ़ितरत है. यानी एक फ़लसफ़ाई बेचैनी, संदेहवाद, आशंका, अंतर्द्वंद्व, विरोधाभास, झक्कीपना, असहमति, दो टूक सा रवैया.


और एक ललकार या एक हुंकार भी वहां है जो भीतर तड़कती है और वहीं गिर जाती है. कविता में उसके तपते हुए छींटे गिरते रहते हैं. तारों का जैसा विस्फोट भौतिकी में नुमायां होता है वैसा प्रमोद कौंसवाल की कविता में आया है.


मैंने दलित को दलित नहीं
काफी ग़रीब और कुचला हुआ कहा
मैंने भारत की संसद के बाहर जाकर
खाक़ उड़ाई और हिंदू-हिंदू कहता हुआ
अपने को ही गालियां देकर
शर्म की पोटली लेकर
लौट आया.


यूं तो कोई अवांगार्द कहलाना पसंद न करे या ख़ुश हो, लेकिन कुछ अलग क़िस्म का रच देने वाले विरल मौकों पर शायद अवांगार्दिज़्म का बड़ा योगदान है. अलग और महत्त्वपूर्ण. असद ज़ैदी के कहे मुताबिक संगीत के दुर्लभ मक़ाम को हासिल कर लेने वाला क्षण.


तो इस लिहाज़ से जो अवांगार्द नहीं भी है वो अपनी कहन और अपनी रचना से ऐसा हो सकता है या ऐसी धारा को रिप्रज़ेंट करता हुआ दिख सकता है. ये वही बात है कि मुख्यधारा से अवांगार्दिज़्म फूटे और फिर उसी में धीरे धीरे समाने लगे. टकराते हुए आए और टकराता हुआ लौटे. अवांगार्दिज़्म की मानो यही ख़ूबी है कि वो मंच बनाता सजाता है और फिर उस मंच की सीमाएं तोड़ देता है. वो मंच से नीचे उतर आता है.


खैर. हम प्रमोद कौंसवाल की कविता की चर्चा कर रहे थे. क्या ये उनका अवांगार्दिज़्म ही है जो सीना ठोंककर कहता है, मै क्यों आत्ममुग्ध.


मैं मुग्ध हूं अपने पर
नहीं हो पाया मोहमंग मुझसे ही मेरा

कोई सुनना पसंद नहीं करता ऐसा कवि मैं
कोई नौकरी नहीं देना चाहता ऐसा नौकर
बात नहीं करना चाहता ऐसा वार्ताकार
आंखें नहीं मिलाना चाहता इस तरह का मिलनसार
मेरे सच पर यकीन नहीं करना चाहता
सुनना नहीं चाहता मुझे कोई ऐसा पुजारी


अब इस आत्मफटकार या इस दुख भरी आत्ममुग्धता को आप अवांगार्दिज़्म का एक विकट संकट कहिए या कवि के हवाले से उसका अपना या उसके समाज का संकट. आप ये भी पूछ सकते हैं कि भला इसे अवांगार्दिज़्म कहें ही क्यों. एक सवाल ये है कि हिंदी कविता में अगर कुछ सच्चे अवांगार्द सरीखा है तो उसकी सबसे ज़्यादा चहलपहल कौन से दौर में है. कौन सी पीढ़ी में है.


शिवप्रसाद जोशी

6 comments:

  1. मैं इस संकलन को पढ़ना चाहूंगा…कैसे मिल सकता है?

    ReplyDelete
  2. प्रमोद कौंसवाल के बहाने अवांगार्दिज्‍म को समझने और समझाने में शिव जोशी ने गहरे पानी में डुबकियां लगाई हैं लेकिन पानी की गहराई दरिया और समुद्र में एक सी नहीं होती। हर जलचर अपनी गहराई तक जाने की सीमाएं जानता है लेकिन प्रमोद जी सीमाएं जानते हुए भी अतिक्रमण करने से नहीं चूकते और शायद यही उनकी असली ताकत है। हांलाकि समय के साथ व्‍यक्तित्‍व में बदलाव होते रहते हैं लेकिन प्रमोद की आत्‍ममुग्‍धता या बेहतर होगा कि आत्‍मफटकार कहा जाए; उनकी ताकत है। असली ताकत। जो उनकी रचनाधर्मिता में उन्‍हें भीड़ में अलग आइडेंटीफाई करती है।

    ReplyDelete
  3. जितना सम्मान प्रमोद कौंसवाल डिज़र्व करते हैं वह उन्हें हमारे कृतघ्न हिन्दी समुदाय ने नहीं दिया. साथ ही यह भी कि भाई शिवप्रसाद ने इधर गद्य के कई बेहतरीन टुकड़े लिखे हैं. इसके लिए वे बधाई के पात्र हैं और शानदार ईमानदार लेखन के लिए धन्यवाद के भी. उन्हें भी उनके हिस्से का सम्मान अभी मिलना शेष है ... लेकिन हिन्दी के ऐसे जर्जर घालमेलभरे युग में ऐसा हो पाएगा कहना मुश्किल जान पड़ता है. दोस्ताना सलाह यह है वे जल्दी जल्दी पचासेक कूड़ा कविताएं लिखकर कोई ईनाम का जुगाड़ फ़िट करें. फिर देखिये वे कितने माननीय बन जाते हैं ... :)

    ReplyDelete
  4. शिव जी सर्वप्रथम आपका तहे दिल से धन्यवाद जो प्रमोद जी के व्यक्तित्व को आपने इस रुप में हमारे सामने रखा। मुझे प्रमोद जी को जानने का मौका मिला फेसबुक के माध्यम से करीबन 2 साल पहले और उनके लेखन का मुरीद बन बैठा और यही उनके करीब लाया भी। साहित्य के चाहने वाले चाहे जितनी दलीले दे लेकिन सत्य यही है कि अधिकतर मै को ही नाम देना चाहते है। प्रमोद जी जैसे कवि,लेखक को भी उनके इस मानसिकता का शिकार होना पडा। खैर उनको लेखक के रुप मे सभी जानते है लेकिन मुझे उनके अंदर का इंसान भी बेहतर लगा ठीक उनकी रचनाओ की तरह - कोमल हृ्दय, बेबाक राय, आदर और संस्कार का अनूठा संगम है प्रमोद कौंसवाल। इसी लिये उनके लिये उनके जन्मदिन पर गत वर्ष कुछ लाइने लिखी थी उनको यंहा पेश कर रहा हूँ क्योकि उनकी पहचान कुछ येसी ही मुझे:

    प्रमोद एक शब्द या एक नाम, ना है तुझसे कोई अंजान
    जन्मदिन पर तुम्हे बधाई, रहे कायम जग में तेरी पहचान

    हर दोस्त हो तुम जैसा, पीडा समझे कौन तुझ जैसा
    निभा पाई न दुनिया साथ अगर,फिर भी कौन बन पाये तुझ जैसा

    कलम से है नाता तेरा, अपनी लेखनी से तूने पहचान बनाई
    बना कर घरोंदा अपने सपनो का, हर दोस्त से दोस्ती तूने निभाई

    स्नेह से भरा है हृ्दय तेरा, आदर का है संस्कार तेरा
    बेबाक अंदाजे बंया है तेरा, तब लागे न तुझे तेरा मेरा

    समझ पाये जो तुझको, प्राप्त हो फिर एक मित्र उसको
    लेखन की समझ हो जिसको,अपने से कैसे दूर करे वो तुझको

    ReplyDelete
  5. हां सचमुच, प्रमोद जी भौतिकी के तारे की तरह तेज़ चमकदार विस्फोट करते हैं, लेकिन विस्फोट के बाद के निशान नहीं छोड़ते, वो गायब हो जाते हैं।

    ReplyDelete
  6. अशोक राठीNovember 23, 2010 at 10:50 PM

    प्रमोद कौंसवाल वैसे हि हैं जैसा कि उनको होना चाहिए था ....और आज भी वो उसी शिद्दत से अपनी सोच को जिन्दा रखे हुए हैं ...मैं देर से उन्हें जान पाया परन्तु मुझे आज भी उनके भीतर की आग धधकती दिखाई देती है जो बीस वर्ष पहले थी....और यही आग कभी कलम को विराम नहीं लेने देगी ...फिर उनके लिखे को दुनिया में सराहा जाये या न सराहा जाए इससे फर्क नहीं पडेगा....लेकिन सूरज अंतत: बादलों को फाडकर निकल हि आता है

    ReplyDelete